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छोड़ दो उन गलियारों को

Posted by Sandeep Shelke on 5th January 2014

जहाँ इन्सान एक नुमाइश बन बैठा हैं ।
जहाँ औरत को बेआबरू कर मर्दानगी दिखाई जाती हैं ।
जहाँ युवक अय्याशी को ही कर्म मानते हैं ।
छोड़ दो उन गलियारों को । १

जो शिक्षा नहीं हाथो में असहायता थमाती हैं ।
जिसे वर्तमान से ज्यादा भूतकाल में रस हैं ।
जहाँ विचार नहीं जाती, पंथ की ही महिमा चलती हैं ।
छोड़ दो उन गलियारों को । २

जहाँ खुद्दारी नहीं चापलूसी जीने का अंदाज हैं ।
जहाँ कामयाबी का केवल रुपय्या ही परख हैं ।
जहाँ पात्रता गुणों से नहीं वंश-परंपरा से बनती हैं ।
छोड़ दो उन गलियारों को । ३

जहाँ आजादी को जिन्दा दफनाया हैं ।
जिसे लगा समाजवाद का रोग हैं ।
जहाँ सूरज भी काली रोशनी देता हैं ।
छोड़ दो उन गलियारों को । ४

— संदीप

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