कृषी देश

एक विचार, एक प्रवास!!

१९४८ से लेकर भ्रष्टाचार से लुटी हुई राष्ट्रिय पूंजी ९१०.६ लक्ष करोड़

Posted by Sandeep Shelke on 24th August 2011

अंग्रेजी में पढ़े

जब कभी नया देश बनता हैं तो उसे अपने हित में अतंगर्त व्यवस्था बनाने का पूरा अधिकार होता हैं और उन्हें बनाना भी चाहिए अपने बेहतर कल के लिए । किंतु हमारे नेताओं ने अंग्रेजो की बनायीं नीतियों कोही अपना धर्म मानकर आगे बढाया और अभी भी बढा रहा हैं । यह सब कायदे-कानून अंग्रेजो ने हमारे शोषण एवं हमें लुटने हेतु बनाये थे, इसमे कोई दो राय नहीं हो सकती । अंग्रेजो ने हमेशा जातीय मुद्दों पर हमें लड़ाया और वैसे कानून भी बनाये।

गांधीजी ने कांग्रेसियों से अनुरोध किया था की स्वतंत्र्यता के बाद कांग्रेस का विसर्जन कर दिया जाये । क्योंकि गांधीजी मानते थे की यह विजय भारत के नागरिकों की हैं नाकि कांग्रेस की । कांग्रेस का विसर्जन तो नहीं हुआ, लेकिन गांधीजी का खात्मा जरुर हो गया । गांधीजी को किसने मारा यह कोई पहेली नहीं हैं, किंतु किसने मरवाया यह अभी न सुलझी हुई पहेली हैं

सभी राष्ट्रप्रेमी नेता या तो १९४७ से कुछ साल पहले या कुछ साल बाद त्याग दिए/मर गए । इस विषय में नाही कोई सवाल पूछता हैं नाही संदेह व्यक्त करता हैं । कितनी कम जानकारी हैं हमें इन सब चीजो के विषय में और जो हैं वह भी लगभग आधा सच ।

हमें पाठशाला में भी पढाया जाता हैं की सवाल मत पूछो बस जितना बताया उतना करो । यह निति अंग्रेजो ने अपनाई थी क्योंकि उन्हें भारतीयों के रूप में अंग्रेज चाहिए थे । अंग्रेजो की दी गयी इस शिक्षा का परिणाम वैसाही हुआ जैसा उन्होंने चाहा था, स्वतंत्रता के बाद के हमारे लुटेरे नेताओं ने लूटने में अंग्रेजों को भी पीछे छोड़ दिया 

और इस लूटकी झलक हैं निचे का ये बड़ा विज्ञापन पत्र  सामने आये आकड़ों के हिसाब से भ्रष्ट अधिकारी और नेताओं ने मिलकर रु. ९१०.६ लक्ष करोड़ की पूंजी लुटी हैं। 

१९४८ में शुरू हुआ लूटने का सिलसिला अभी भी पुरे जोरों से जारी हैं । जैसे लुटेरों से हमें कभी आज़ादीही न मिली हो ।

आज हमारे अपनेही नेतागण हमसे अंग्रेजोसे भी बद्तर व्यवहार कर रहे हैं ।

जय भारत!
सरफरोशो ने जिसे लहू देके सींचा, हैं ऐसे गुलशन को उजड़ने से बचा लो यारों ।

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Corruption loot amount Rs. 910.6 Lakh Crores since 1948

Posted by Sandeep Shelke on 23rd August 2011

Read in Hindi

Whenever a new nation is formed it has all right to re-enact the system in national interest and they must for better future. But our politicians decided to continue the laws and regulations of British and they still are continuing. British enacted all the laws, undoubtedly, for exploiting and looting us. British always used divide and rule tactics and made such laws for their help.

Mahatma Gandhiji had asked Congressmen to dissolve Congress party immediately after transfer of government in 1947. Because Gandhiji thought that people fetched victory and not Congress party alone. Congress did not dissolve, but Gandhiji was dispensed. Who killed Gandhiji isn’t a mystery, but who got him killed is still a mystery.

All patriotic nationalist leaders either died/abandoned just before and after freedom in 1947. No one questioned or raised any doubt about all such scandalous happenings. How ill-informed we are about these important issues and whatever we know is half truth (more dangerous than no knowledge).

We are taught in school/colleges to not question and just follow whatever asked. British used this tactic since they needed black British who were Bharatiy in look but English in soul, (some call them Macaulayian clerks). And the very education yielded as per their expectations, our politicians looted us more than British could.

And a sample of this loot is the poster bellow. This just the uncovered list which cost us more than 910.6 Lakh Crores since 1948. Which is 50 times the total yearly tax collection put together by center and all states.

Started in 1948 and still continues. In a sence we never got freedom from looters.

जय भारत!
सरफरोशो ने जिसे लहू देके सींचा, हैं ऐसे गुलशन को उजड़ने से बचा लो यारों ।

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Scams in Inda Since Independence

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यल्गार

Posted by Sandeep Shelke on 26th July 2011

हिंदी में यल्गार

आज, जवळपास, प्रत्येक तरुणाला नौकरी, लग्न आणि स्वतःचे घर पाहिजे. जे स्वतःच्या आई-वडिलांना अडचण मानून स्वतंत्र घराची तयारी करतात असले तारुण्य काय उपयोगाचे? आणि ह्यांच्याकडून अपेक्षा तरी काय करणार?

आणि जर देशाची भावी पिढीच बेजबाबदार आणि आत्मकेंद्री असेल तर ओरडायचे तरी कोणाकडे? चुका केलेल्या मागच्या पिढीकडे? ज्यांना स्वतःच्या पोटाची एवढी भ्रांत होती कि योग्य-अयोग्य, नैतिक-अनैतिक ह्याकडे लक्ष द्यायला वेळच नाही मिळाला कि स्वातंत्र्यप्राप्तीनंतर देशबांधणीसाठी दिशाच नाही मिळाली?

सगळीकडे हीच बोंब. शेतकऱ्याला मुलगी देण्याऐवजी आडात ढकलून देण्याच्या गोष्टी जेव्हा एक शेतकरीच बोलतो त्यावेळी जो त्रास होतो तो असह्य असतो.

आपल्या अडचणी:

१. कुचकामी शिक्षण व्यवस्था.

२. बेजबाबदार आदर्शशुन्य पालक.

३. कर्तव्य विसरलेले गुरुजन.

४. भरकटलेले तरुण-तरुणी.

५. पैसा म्हणजे सर्वस्व मानणारा (वाढत जाणारा) समाजवर्ग.

६. स्वैर, अकार्यक्षम, गुंड, लबाड, देश विघातकी राजकारणी.

७. भ्रष्ट, कामचुकार पोलीस आणि सरकारी कर्मचारी.

८. कमी झालेली श्रमप्रतिष्ठा कारण पैसा कमी तर लायकी कमी.

९. परकियांच्या आणि देश विघातकी लोकांच्या हातचे बाहुले बनलेले, काही अपवाद वगळता, पत्रकार, वर्तमानपत्र आणि वृत्त माध्यमे.

आणि आपला समाज, सगळ्यात मोठी अडचण. 

जसा आपण काही कार्यारंभ करतो तसा लगेचच खेचा-खेची आरंभ होतो. कोणीही स्वतःला महाराणा प्रताप, जिजाऊ, शिवबा, ताराबाई, महात्मा फुले, लक्ष्मीबाई, विवेकानंद, भगतसिंग, राजगुरू, चापेकर इ. प्रमाणे देशासाठी वाहून घ्यायला कि तसे बोलायलाही तयार नाहीत. अर्ध्याहून अधिक भारतभूमी नक्षलवाद्यांच्या, दहशतवाद्यांच्या कुकृत्यांनी होरपळत आहे. अवघा देश सत्तांध नेत्यांच्या पोलीस आणि प्रशासकीय अधिकाऱ्यांच्या मदतीने चालविलेल्या अत्याचाराने जर्जर झाला आहे.

ज्या भारतमातेने आपल्याला ओळख दिली तीच आता मदतीसाठी टाहो फोडत आहे आणि आपणमात्र सणवार, क्रिकेट आदीमध्ये मग्न आहोत.

“लोकशाही नावाला आणि सत्ता राजकारण्यांच्या गावाला.”

आता अजून सहन नाही करायचे, ह्या भ्रष्ट आणि देशद्रोही नेत्यांच्या विरोधात यल्गार पुकारायचे.

जय भारत!

शूर आम्ही सरदार आम्हाला काय कुणाची भीती.

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यल्गार

Posted by Sandeep Shelke on 26th July 2011

मराठी मधे यल्गार

आज, लगभग, हर युवक-युवती नौकरी, शादी और अपना घर चाहते हैं। जो अपने माता-पिता को बोज मानकर स्वतंत्र आवास की तैयारी करते हैं ऐसे युवा किस काम के? ऐसे युवक-युवतियोंसे भला कोई क्या अपेक्षा रखेगा?

और जब देश की आनेवाली पीढ़ी ही इतनी गैरजिम्मेदार, आत्मकेंद्रि हो तो आशा की नज़रों से किसकी और देखें, किसके नाम की दुहाई दे, किसको मदत के लिए पुकारें? हमें इस कगार पर लानेवाली गत पीढियोंसे? जिन्हें अपने खाने-पिने का सवाल इतना महत्त्वपूर्ण लग रहा था की सही-गलत, नैतिक-अनैकित इन सब की ओर ध्यान देने का समय ही नहीं मिल पाया। जो स्वातंत्र्य के बाद राष्ट्र निर्माण के लिए दिशा नहीं दे पाए।

चारो ओर यही शोकांतिका हैं। किसी किसान से अपनी बेटी का ब्याह करने से बेहतर उसे कुए में धकलेना हैं ऐसा जब कोई किसानही सोचता हैं तो बेहद पीड़ा होता हैं।

हमारी समस्याएं:

१. बेकार और प्रभावहीन शिक्षण व्यवस्था।

२. गैरजिम्मेदार आदर्शहीन पालक।

३. कर्महीन गुरुजन।

४. दिशाहीन युवक-युवती।

५. पैसा अपना सर्वस्व माननेवाला (तेजीसे बढ़ता हुआ) समाजवर्ग।

६. अकार्यक्षम, गुंडागर्दी करनेवाले, मक्कार, देशद्रोही राजकीय नेता मंडली।

७. भ्रष्ट, भोगविलासी एवं कामचोर पुलिस और बाबु लोग।

८. घटता श्रममूल्य क्योंकि पैसा कम तो हैसियत कम।

९. परदेशियोंके और देश विघताकी लोगों के हात की कटपुतली बने हुने पत्रकार, वर्तमानपत्र एवं प्रसार माध्यम।

और अपना समाज, सबसे बड़ी समस्या।

जैसेही आप कुछ कार्यारंभ करें समाज में आपकी खिचायीं आरंभ होती हैं। आज कोई भी अपने आप को महाराणा प्रताप, जिजाबाई, छ. शिवाजी महाराज, ताराबाई, महात्मा फुले, रानी लक्ष्मीबाई, स्वामी विवेकानंद, भगतसिंह, राजगुरू, चापेकर आदि राष्ट्रवीर तथा प्रतिभाशाली व्यक्तिओं के आदर्शानुसार देश के लिए समर्पित करने या चर्चा करने को भी तैयार नहीं हैं। आज आधे से ज्यादा भारतभूमि नक्सलियों, आतंकवादियों की आतंक से दहेक रही हैं। पूरा भारतवर्ष नेतओं के, बाबुओं एवं पुलिसवालों द्वारा चलाये गए, अत्याचारों से जर्जर हो उठा हैं।

भारत माँ – जिसने हमें पहचान दी – आज मदत की गुहार लगा रही हैं और हम मजे से दिवाली-होली मना रहे हैं।

“लोकशासन नाम के लिए और सत्ता नेताओं के काम के लिए”

अब और बर्दाश्त नहीं करना चाहिए, इन सब देशद्रोहियों तथा भ्रष्ट नेतओं के विरुद्ध यल्गार करना जरुरी हैं

जय भारत!

जो वतन के कम न आये खाक वह जवानी हैं।

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जागने का वक्त आ गया है

Posted by Sandeep Shelke on 10th May 2011

4 जून 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में स्वामी रामदेवजी आमरण अनशन पर बैठेंगे :

राष्ट्रनिष्ठ गुरु बंधु / बहिन
भारत स्वाभिमान आंदोलन की क्रमबद्ध मुहिम मे 30 जनवरी, 27 फरवरी, 23 मार्च के कार्यक्रमों की अभूतपूर्व सफलता के पश्चात आंदोलन निर्णायक मोड पर है । सत्य की इस लड़ाई में आपका सहयोग अपेक्षित है ।
4 जून 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में स्वामीजी अनिश्चित कालीन उपवास (आमरण अनशन ) पर बैठेंगे ।

– मुख्य केंद्रीय प्रभारी डॉ. जयदीप आर्य, राकेश कुमार , बहिन सुमन

सहयोग हेतु रजिस्ट्रेशन कराने के लिए यहाँ क्लिक करे

राष्ट्रहित में तीन माँगे

  • लगभग चार सौ लाख करोड़ रुपये का काला धन जो की राष्ट्रीय संपत्ति है यह देश को मिलना चाहिए ।
  • सक्षम लोकपाल का कठोर कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर पूर्ण अंकुश लगाना ।
  • स्वतंत्र भारत में चल रहा विदेशी तंत्र (ब्रिटिश रूल ) खत्म होना चाहिए जिससे कि सबको आर्थिक व सामाजिक न्याय मिले ।

जय भारत !

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हा देश कोणाचा आणि इथली मानसं आहेत तरी कोण

Posted by Sandeep Shelke on 5th March 2011

जेव्हा क्रिकेटच्या भाकऱ्या भाजणारे मला सापडले पण देश ओरबाडला जात असताना ब्र शब्दही न बोलणारे आढळले तेव्हा मला खालील काही ओळी सुचल्या.

हा देश कोणाचा आणि इथली मानसं आहेत तरी कोण
ज्यांना नाही कसलीच जान, झाले जरी देशाचे स्मशान

बघूनही दिसत आणि ऐकूनही कळत नाही, असली ह्यांची जात
टाहो फोडते आहे जननी तरीही चकाट्या पिटती दाही दिशांत

काहींना काळजी सचिनच्या शतकाची तर काहींना क्रिकेटमधल्या जयाची
असे-कसे रे संवेदनाहीन तुम्ही पर्वा नाही मानवतेची कि जीवनाची

भ्रष्ट, लुटारू, खोटारड्या आणि देश-विघातक्यांचा वाढतोय जोर
अंधकारमय भवितव्य असताना राहू कसे शकता तुम्ही बिनघोर

गरज आहे फ़क़्त जागे होऊन बघण्याची आणि जबाबदारी स्विकारण्याची
वेळ आली आहे ति निर्धार करून शत्रूवर पुरता हल्ला चढविण्याची

उतरवून फेका डोळ्यावरील दुंधीची चादर, झुगारून टाका सारे पाश
हीच वेळ आहे मोक्याची अन्यथा अटळ  आहे आपला सर्वनाश

दुष्टप्रवृत्ती विरोधातील लढ्यात आपुल्याला बळ देईल भवानी माता
भान राहूदे तुज मावळ्या गानिमाशी शिवबासवे लढली अवघी जनता

-राष्ट्रप्रेमी

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