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Archive for the 'कविता' Category

जिथे मन भयमुक्त आहे आणि माथा उंचावलेला आहे

Posted by Sandeep Shelke on 11th January 2014

चित्त जिथे भयमुक्त आहे,

माथा जिथे उंच आहे,

ज्ञान जिथे मुक्त आहे,

जिथे दिवस रात्री ह्या धरेला आपल्या क्षुद्र हेतूंनी विभागले जात नाही

प्रत्येक वाक्य जिथे हृदयापासून निघते,

कर्माचे अजस्त्र स्रोत दाही दिशांमधून फुटून अबाधितपणे वाहत आहेत,

जिथे शुद्ध विचारांची सरिता तुच्छ रुढींच्या वाळवंटात हरवली नाही,

जिथे पुरुषार्थ शेकडो तुकड्यांमध्ये विभागाला नाही,

जिथे कर्म, भावना, आणि आनंदानुभूती तुझ्यामुळे आहे,

हे तात, आपल्या हातांनी निर्दयीपणे आघात करून,

अशा स्वातंत्र्याच्या स्वर्गात ह्या निद्रिस्थ भारतास जागव.

– रवींद्रनाथ ठाकूर

उल्लेख:
Chitto jetha Bhayashunyo
गीतांजली रविंद्रनाथांची माझ्या मराठीत – सौ ज्योती कुलकर्णी

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छोड़ दो उन गलियारों को

Posted by Sandeep Shelke on 5th January 2014

जहाँ इन्सान एक नुमाइश बन बैठा हैं ।
जहाँ औरत को बेआबरू कर मर्दानगी दिखाई जाती हैं ।
जहाँ युवक अय्याशी को ही कर्म मानते हैं ।
छोड़ दो उन गलियारों को । १

जो शिक्षा नहीं हाथो में असहायता थमाती हैं ।
जिसे वर्तमान से ज्यादा भूतकाल में रस हैं ।
जहाँ विचार नहीं जाती, पंथ की ही महिमा चलती हैं ।
छोड़ दो उन गलियारों को । २

जहाँ खुद्दारी नहीं चापलूसी जीने का अंदाज हैं ।
जहाँ कामयाबी का केवल रुपय्या ही परख हैं ।
जहाँ पात्रता गुणों से नहीं वंश-परंपरा से बनती हैं ।
छोड़ दो उन गलियारों को । ३

जहाँ आजादी को जिन्दा दफनाया हैं ।
जिसे लगा समाजवाद का रोग हैं ।
जहाँ सूरज भी काली रोशनी देता हैं ।
छोड़ दो उन गलियारों को । ४

— संदीप

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विश्वाची चिंता मज सतावते

Posted by Sandeep Shelke on 5th January 2014

कोण जाने का घरोघरी दुखः नांदते
न जाणे का विश्वाची चिंता मज सतावते

क्षणभंगुर आयुष्याची चटक एवढी लागते
सत्याचे रूपक मृत्यू शत्रू सम भासते

का केली बापुड्या घाई जगण्याची
निदान तारुण्य तरी उरकायचे सावकाश

प्रेम आणि सुखाच्या आमिषाने मनाचे झाले पायपुसणे
कसले प्रेम नि कसले सुख
आता घर आहे कधी धुराचे, कधी सुराचे तर कधी मयाचे

जिंकण्याची ओढ नव्हती मला कधीच
पण मला कळायच्या आधीच स्पर्धेने मला ओढले

— संदीप

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शिवाजी – सेर सिवराज है

Posted by Sandeep Shelke on 20th February 2013

“छत्रपति शिवाजी महाराज”

इंद्र जिमी जम्भ पर बाड्व सुअम्ब परShivaji Maharaj
रावण सदम्भ पर रघुकुलराज है ||१||
पौन बरिवाह पर | संभु रतिनाह पर |
ज्यो सहसबाह पर | राम द्विजराज है ||२||
दावा द्रुम दंड पर | चिता मृग झुंड पर |
भूषण बितुंड पर | जैसे मृगराज है ||३||
तेजतमअंस पर | कान्ह जिमी कंस पर |
त्यों म्लेंछ बंस पर| सेर सिवराज है ||४||
-कविराज भूषण

जय भारत!

स्रोत श्री नितीन बानगुडे पाटील

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ऐल तटावर पैल तटावर

Posted by Sandeep Shelke on 11th September 2011

ऐल तटावर पैल तटावर हिरवळी घेऊनLarge Blog Image
निळासावळा झरा वाहतो बेटाबेटांतुन

चार घरांचे गाव चिमुकले पैल टेकडीकडे
शेतमळयांची दाट लागली हिरवी गर्दी पुढे

पायवाट पांढरी तयातून अडवी तिडवी पडे
हिरव्या कुरणांमधुन चालली काळया डोहाकडे

झाकळूनी जल गोड काळिमा पसरी लाटांवर
पाय टाकु नी जलात बसला असला औदुंबर

– बालकवी (त्र्यंबक बापुजी ठोंबरे)

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“सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं”

Posted by Sandeep Shelke on 19th August 2011

कवी दिनकरजी ने यह कविता भारत के गणतंत्र दिन के अवसर पर लिखी थी । २६ जनवरी १९५१ को भारत ने अपना पहला गणतंत्र दिन मनाया तब दिनकरजी ने यह बेहद सुंदर कविता राष्ट्र को समर्पित की । उस समय भारत की जन्संन्ख्या ३३ करोड़ थी, आज हम १२१ करोड़ से भी ज्यादा हैं । आज इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध  में जब आम नागरिक राष्ट्रहित में रास्ते पर उतर आये हैं, तब यह कविता फिरसे वही रोमांच दिलाती हैं ।

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सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं ।

जनता? हाँ, मिट्टी की अबोध मुरते वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली,
जब अंग अंग में लगे साँप हो चूस रहे,
तब भी न मुँह खोल दर्द कहने वाली ।

लेकिन, होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपकुल हो भृकुटी चढ़ती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं ।

हुँकारों से महलों की नीव उखड जाती,
साँसों के बल से ताज हम में उड़ता हैं,
जनता की रोके राह समय में ताब कहाँ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता हैं ।

सबसे विरत जनतंत्र जगत का आ पहुँचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंघासन तैयार करों,
अभिषेक आज रजा का नहीं, प्रजा का हैं,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो ।

आरती लिए तू किसे ढूंढ़ता हैं मुरख,
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में
देवता कही सड़कों पर मिट्टी तोंड रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में ।

फावड़े और हल राजदंड बनाने को हैं,
धूसरता सोने से शृंगार सजाती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं ।

-कवी रामधारी सिंह दिनकर

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