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Archive for August 24th, 2011

Understanding ‘Society’, ‘Civil Society’ and ‘State’

Posted by Sandeep Shelke on 24th August 2011

Since start of this year, 2011, we are seeing a conflict between civil society and state in Bharat. Though all of us know little piece about each but mostly we lack the clear knowledge. Here is my attempt to explain the terms in tweet format. Yesterday I was tweeting about Society, Civil Society and State through my twitter handle @SandeepShelke which I’m reproducing here as it is (not in any particular order).

What is Society?

Society is a community with hierarchically organized & maintained social practices which establishes the power equations and relationships among the members of the society. tweet.

What is Civil Society?

  1. Its a public sphere of society.
  2. Its a place where expressions are meditated through debates and discussions. tweet
  3. It concerns itself to matters relating to society.
  4. It controls & makes state responsible thru democratic practices. tweet
  5. It monitors democratic norms & procedures.
  6. It makes sure that political accountability is present in social order apart from political system (state). tweet
  7. Its a process which seeks to breach & counteract the totalization attempted by the state.
  8. Its a place where state is forbidden to shape any opinion. tweet

In short Civil Society is an open platform for members of society to present, discuss, debate various ideas, experiences. State must not interfere and try not shape the decision. It also keeps check of ‘limits on state power’. tweet

What is State?

  1. It has power to legitimize & recognize social relations.
  2. It is distinct & irreducible(why). tweet
  3. It is a set of specifically political practices which define & enforce binding decisions.
  4. It intervenes every aspect of life of members of society. tweet
  5. Only it can coerce, no other organization can coerce. But it derives power from society and social interest must be on forefront.
  6. It gives fixity to social relations & social stability to society. tweet
  7. It must remain within framework of a given society, but has to re-enact rules as per social changes. tweet

State has power entrusted by society to select, categorize, crystallize & arrange power in formal codes & institutions for taking decisions, enforcing decisions & coercing decisions if anyone defies. tweet

Hope this helps a little bit, maybe a first step for further understanding and exploration on these topics.

Jai Bharat!

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१९४८ से लेकर भ्रष्टाचार से लुटी हुई राष्ट्रिय पूंजी ९१०.६ लक्ष करोड़

Posted by Sandeep Shelke on 24th August 2011

अंग्रेजी में पढ़े

जब कभी नया देश बनता हैं तो उसे अपने हित में अतंगर्त व्यवस्था बनाने का पूरा अधिकार होता हैं और उन्हें बनाना भी चाहिए अपने बेहतर कल के लिए । किंतु हमारे नेताओं ने अंग्रेजो की बनायीं नीतियों कोही अपना धर्म मानकर आगे बढाया और अभी भी बढा रहा हैं । यह सब कायदे-कानून अंग्रेजो ने हमारे शोषण एवं हमें लुटने हेतु बनाये थे, इसमे कोई दो राय नहीं हो सकती । अंग्रेजो ने हमेशा जातीय मुद्दों पर हमें लड़ाया और वैसे कानून भी बनाये।

गांधीजी ने कांग्रेसियों से अनुरोध किया था की स्वतंत्र्यता के बाद कांग्रेस का विसर्जन कर दिया जाये । क्योंकि गांधीजी मानते थे की यह विजय भारत के नागरिकों की हैं नाकि कांग्रेस की । कांग्रेस का विसर्जन तो नहीं हुआ, लेकिन गांधीजी का खात्मा जरुर हो गया । गांधीजी को किसने मारा यह कोई पहेली नहीं हैं, किंतु किसने मरवाया यह अभी न सुलझी हुई पहेली हैं

सभी राष्ट्रप्रेमी नेता या तो १९४७ से कुछ साल पहले या कुछ साल बाद त्याग दिए/मर गए । इस विषय में नाही कोई सवाल पूछता हैं नाही संदेह व्यक्त करता हैं । कितनी कम जानकारी हैं हमें इन सब चीजो के विषय में और जो हैं वह भी लगभग आधा सच ।

हमें पाठशाला में भी पढाया जाता हैं की सवाल मत पूछो बस जितना बताया उतना करो । यह निति अंग्रेजो ने अपनाई थी क्योंकि उन्हें भारतीयों के रूप में अंग्रेज चाहिए थे । अंग्रेजो की दी गयी इस शिक्षा का परिणाम वैसाही हुआ जैसा उन्होंने चाहा था, स्वतंत्रता के बाद के हमारे लुटेरे नेताओं ने लूटने में अंग्रेजों को भी पीछे छोड़ दिया 

और इस लूटकी झलक हैं निचे का ये बड़ा विज्ञापन पत्र  सामने आये आकड़ों के हिसाब से भ्रष्ट अधिकारी और नेताओं ने मिलकर रु. ९१०.६ लक्ष करोड़ की पूंजी लुटी हैं। 

१९४८ में शुरू हुआ लूटने का सिलसिला अभी भी पुरे जोरों से जारी हैं । जैसे लुटेरों से हमें कभी आज़ादीही न मिली हो ।

आज हमारे अपनेही नेतागण हमसे अंग्रेजोसे भी बद्तर व्यवहार कर रहे हैं ।

जय भारत!
सरफरोशो ने जिसे लहू देके सींचा, हैं ऐसे गुलशन को उजड़ने से बचा लो यारों ।

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यल्गार
और सत्ताकारणी – एक शंड आणि निलाजरी जमात और दर्द होता रहा छटपटाते रहे और प्रति भारत और भारती

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